What are truth of India Gate?

इंडिया गेट की क्या सच्चाई...
तुम इंडिया गेट तो गए ही होगे। इसे 26 जनवरी को टीवी पर भी देखा होगा, जब गणतंत्र दिवस की परेड यहां से निकलती है। शायद तुमने यहां शाम के समय आइसक्रीम और चाट का भी आनन्द उठाया होगा। आसपास बने फव्वारे और बगीचे भी तुम्हें खूब अच्छे लगे होंगे। लेकिन क्या तुम कभी इंडिया गेट के बहुत करीब गए हो? क्या तुमने उसकी दीवार को गौर से देखा है? अगर हां, तो तुम्हें इसकी दीवार पर कुछ नाम भी लिखे हुए दिखे होंगे? जब तुमने पापा से पूछा होगा कि ये नाम किनके हैं, तो पापा ने जवाब दिया होगा कि ये शहीदो के नाम हैं।
आइए, आज हम जानते हैं कि इंडिया गेट पर लिखे ये नाम किन सैनिकों के हैं और इंडिया गेट को किसने बनाया, क्यों बनवाया?
इसका निर्माण 1921 ई. में हुआ था। ब्रिटिश राज परिवार के डय़ूक ऑफ कनॉट के बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा , जिनके नाम पर कनॉट प्लेस का नाम रखा गया था ( अगर नही जानते तो बता दूँगी अगर आप मित्र चाहोगे तो )। इसी डय़ूक ऑफ कनॉट ने इंडिया गेट के निर्माण की पहली ईंट रखी थी। यानी उन्होंने ही इसका शिलान्यास किया था। इसके लिए तब के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट सर इडविन लुटियंस ने इंडिया गेट का डिजाइन तैयार किया था। इंडिया गेट को बनने में लगभग 10 साल लग गए। 1931 में यह बनकर तैयार हो गया। राष्ट्रपति भवन के सामने वाली सड़क को राजपथ कहा जाता है। इस सड़क पर 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट बनकर तैयार हो गया।
इसकी दीवार पर लगभग 90 हजार सैनिकों के नाम लिखे हुए हैं। तुम सोच रहे होगे कि इतने सारे सैनिक! ये सैनिक कौन थे?
यह प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेज साम्राज्य की रक्षा के लिए मरने वाले सिपाहियों की याद में बना है जिसकी नींव 10 फरवरी 1921 में डाली गई थी और 1931 में जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दी जा रही थी तो इन शहीदों के हत्यारा लार्ड इरविन ने राष्ट्रीय स्मारक घोषित करके इसे भी हमारे मत्थे पर जड़ दिया था। यह कह कर कि यह है भारत की राष्ट्रीय निशानी, साम्राज्य की वफादारी। इंडिया गेट पर खुदे नामों में एक भी नाम हमारे स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों का नहीं है।
लेकिन जब इंडिया गेट बना तो इसे अमर शहीदों के नाम समर्पित कर दिया गया। बाद में जब भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 में युद्ध हुआ तो उसमें शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए यहां अमर जवान ज्योति का निर्माण किया गया।
इस गेट को खूबसूरत बनाने के लिए राजस्थान के भरतपुर से लाल पत्थर मंगवाया गया था। इंडिया गेट को एडविन लुटियंस ने डिजाइन किया था जिस पर शहीदों के नाम लिखे हैं।
अमर जवान ज्योति का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत-पाक 1971 के युद्ध के स्मारक के तौर पर 26 जनवरी 1972 को किया था।
याद रहे, 26 जनवरी 1930 को भारत की जनता ने संपूर्ण आजादी हर तरीके से लेने का संकल्प रावी के किनारे पं. नेहरू व महात्मा गांधी के नेतृत्व में लिया था। 1947 के बाद उस संकल्प को भुला कर भारतीय सरकारें आज भी उस साम्राज्यवादी गुलामी के प्रतीक इंडिया गेट को सलाम करते हैं। हमें याद रहे कि पहला विश्व युद्ध अंग्रेजों ने अपनी प्रभुता के लिए और अफगानिस्तान को गुलामी में जकड़ने के लिए लड़ा था। कुछ महान इतिहासकार तो यह भी कहते हैं कि ...यह जंग तो घरेलू जंग थी इंग्लैंड के बादशाह, फ्रांस के बादशाह और जर्मन बादशाह के बीच। ये तीनों नजदीकी रिश्तेदार थे।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस जंग में एक तरफ तो भारतीय सिपाहियों को मरवाया गया था और दूसरी तरफ भारतवासियों को ब्रिगेडियर जनरल डायर ने तोहफा दिया था 1919 में जलियांवाला बाग का कत्लेआम करवाकर और पंजाब के शहरों व गुजरात में हवाई जहाज से बम गिराकर। हजारों भारतीयों की लाशों को बिखेरकर उनकी देशभक्ति की भावनाओं को दबाने के लिए अंग्रेजों ने इंडिया गेट के रूप में साम्राज्य के वफादारों की निशानी हमारे सीने पर खड़ी की थी।
आज अंग्रेजों के जाने के 63 वर्ष बाद भी दिल्ली में भारत सरकार 1757 से लेकर 1947 तक के स्वाधीनता आंदोलन में जीवन लगाने व न्यौछावर करने वाले लाखों ज्ञात-अज्ञात देशभक्त शहीदों को भुला कर ही नहीं बल्कि उनकी अवहेलना कर, इंडिया गेट को शहीदों की याद बताकर आजादी के प्रतीक दिन, हर 26 जनवरी और 15 अगस्त को इंडिया गेट पर सिर झुकाती है, आखिर क्यों? जबकि भारत सरकार अच्छी तरह जानती हैं कि इंडिया गेट पर खुदे नामों में एक भी नाम हमारे स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों का नही है।
इंडिया गेट की नींव 10 फरवरी 1921 को डाली गयी थी और 1931 में जब शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी जा रही थी तो इन शहीदों का हत्यारा लार्ड इरविन ने इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करके इसे भी हमारे मत्थे पर जड़ दिया था। यह कह कर कि ‘‘यह है इंडिया की राष्ट्रीय निशानी, अंग्रेज साम्राज्य की वफादारी का प्रतीक, जो अंग्रेजों के लिए लड़ेगा, उसे सम्मान दिया जाएगा, जो आजादी के लिए लड़ेगा- उसे फांसी।’’
दिल्ली पर राज करने वाली सरकारों ने सन 47 के बाद स्वाधीनता आंदोलन में जीवन लगाने व न्यौछावर करने वाले लाखों ज्ञात-अज्ञात देशभक्त शहीदों के साथ भारतीय सिपाहियों की कुर्बानी का भी मखौल उड़ाया हैं , जब 1971 में भारतीय सिपाहियों की याद में जवान ज्योति को इसी इंडिया गेट की छत्र-छाया में बनाया। क्या आजाद भारत में उनके लिए कोई राष्ट्रीय यादगार बनाने के लिए भी जगह नहीं थी या फंड नहीं था?

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