Monday, 21 December 2015

Oxidation and reduction



ऑक्सीकरण तथा अपचयन


ऑक्सीकरण (Oxidation)


यह एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें पदार्थ ऑक्सीजन से मिल जाता है अथवा उसकी हाइड्रोजन निकल जाती है। दूसरे शब्दों में ऑक्सीकरण वह प्रक्रम है जिसमें पदार्थ के इलेक्ट्रॉन कम हो जाते हैं। ऑक्सीकारक पदार्थ वे पदार्थ हैं जो दूसरे पदार्थों को ऑक्सीकृत कर देते हैं, जैसे पोटैशियम परमैंगनेट (्यरूठ्ठह्र४), नाइट्रिक अम्ल (॥हृह्र३) आदि।


अपचयन (Reduction)


अपचयन एक ऐसा प्रक्रम है जिसमें ऑक्सीजन निकलती है और हाइड्रोजन का संयोग होता है। आधुनिक परिभाषा के अनुसार अपचयन वह प्रक्रम है जिसमें पदार्थ के इलेक्ट्रॉन अधिक हो जाते हैं। अपचायक वे पदार्थ हैं जो दूसरे पदार्थों का अपचयन करते हैं तथा वे स्वयं ऑक्सीकृत हो जाते हैं, जैसे हाइड्रोजन सल्फाइड (॥२स्), हाइड्रोजन (॥२), कार्बन (ष्ट) आदि।





विलेय, विलयन व विलायक


दो या दो से अधिक अणुओं, परमाणुओं अथवा आयनों या पदार्थों का समांगी मिश्रण (homogeneous Mixture) विलयन (Solution) कहलाता है। जो पदार्थ घुलता है, उसे विलेय (solute) तथा जिस माध्यम में उसे घोला जाता है, वह विलायक (solvent) कहलाता है। यदि विलेय का अनुपात कम हो तो विलयन तनु (dilute) कहलाता है, तथा यदि विलेय का अनुपात अधिक हो तो विलयन सांद्रित (concetrated) कहलाता है।
किसी विलायक द्वारा विलेय पदार्थ को घोलने की क्षमता ही उसकी विलेयता (solubility) कहलाती है।


परासरण (Osmosis)


परासरण (osmosis) विलयन से सम्बद्ध एक असाधारण परिघटना है। यह विलायक अणुओं का अद्र्धपारगम्य (semipermeable) झिल्ली द्वारा कम सांद्रता वाले विलयन से अधिक सांद्रता वाले विलयन की ओर विसरण है।
मोलर व नॉर्मल विलयन- एक लीटर विलायक में एक मोल विलेय का विलयन मोलर (1mव) विलयन कहलाता है। एक लीटर जल में 40 ग्राम NaOH से एक मोलर NaOH विलयन बनता है।


मोललता (Molality) - प्रति 1000 ग्राम विलायक में विलेय के मोलों की संख्या को मोललता कहते हैं।



हाइड्रोकार्बन
हाइड्रोजन व कार्बन से बने यौगिक हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। कार्बन परमाणुओं में स्वयं से बंधन करने का विलक्षण गुण पाया जाता है, जिसे शृँखलन (catenation) कहते हैं। इस गुण के कारण यह असंख्य हाइड्रोकॉर्बन के निर्माण में सक्षम हैं। हाइड्रोकार्बन का मुख्य स्रोत जीवधारी व पेट्रोलियम हैं। उदाहरण-



CH3-CH2-CH2-CH3


(normal beutane)








हाइड्रोकार्बन प्रत्यक्ष रूप से कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल इत्यादि के रूप में जीवन के आधार हैं। अधिकतर औषधियाँ, कृषि रसायन, ईंधन तथा प्लास्टिक भी हाइड्रोजन व कार्बन से बने यौगिक हैं।
हाइड्रोकार्बन दो भागों में विभाजित किए जा सकते हैं-
संतृप्त हाइड्रोकार्बन- ऐसे हाइड्रोकार्बन जिनके परमाणु परस्पर केवल एक आबंध (Single Bond) द्वारा जुड़े हों। उदाहरण - ब्यूटेन ( CH3-CH2-CH2-CH3)
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन- ऐसे हाइड्रोकार्बन बहु-आबंध (Multiple Bond) से जुड़े हों। उदाहरण- बेंजीन (C6H6) ।





प्रकृति में कार्बन चक्र व प्रकाश संश्लेषण


वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगभग निश्चित (0.04 प्रतिशत) रहती है। सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधे वायुमंडल से CO2 ग्रहण करके तथा क्लोरोफिल की सहायता से इसको ग्लूकोज, स्टार्च तथा सेलुलोज में बदल देते हैं। इस क्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहते हैं, इसे निम्न रूप से प्रदर्शित किया जाता है-
6CO2+6H2O → C6H12O6 + 6O2 (ग्लूकोज)



nCO2 + nH2O → [C(H2O)]n +nO2
इस अभिक्रिया में बनने वाली ऑक्सीजन वायुमंडल में मिल जाती है। रात्रिकाल में पौधे वायुमंडल से O2 लेते हैं व CO2 छोड़ते हैं। रात्रि के समय छोड़ी जाने वाली CO2 दिन में ग्रहण की गई CO2की तुलना में बहुत कम होती है। अत: जो CO2 श्वसन व दहन में उत्पन्न होती है, वह पौधों द्वारा ही उपयोग में ली जाती है। अर्थात् वायुमण्डल में CO2 की मात्रा में कोई CO2 परिवर्तन नहीं होता है।
जीवों द्वारा निकाली गई CO2 व पौधों द्वारा ली जाने वाली CO2 के बीच एक चक्र चलता है। इस प्रक्रिया को कार्बन चक्र कहते हैं।


नाइट्रोजन चक्र


नाइट्रोजन प्राणियों व वनस्पतियों के लिए एक आवश्यक संघटक है और वृद्धि के लिए अपरिहार्य है। नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत वायुमण्डलीय नाइट्रोजन है, परंतु प्राणियों और पादपों (Plants) में इस नाइट्रोजन को ग्रहण करने की क्षमता नहीं है। प्राणियों को नाइट्रोजन की आपूर्ति पादपों से होती है और पादपों को मृदा से मिलती है। प्रकृति में नाइट्रोजन का एक चक्र निरंतर चलता रहता है जो वायुमंडल में इसकी मात्रा को एक समान बनाए रखता है। मुक्त वायुमंडलीय नाइट्रोजन का नाइट्रोजनयुक्त यौगिकों में परिवर्तन नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Nitogen Flixation) कहलाता है।








अम्ल, क्षारक व लवण (Acid, Base & Salt)



अम्ल (Acid)- अम्ल हाइड्रोजनयुक्त पदार्थ होते हैं। जलीय विलयन में वे हाइड्रोजन आयन (H+) बनाते है। उदाहरण -सल्फ्यूरिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल आदि।
क्षारक (BAse)- क्षारक ऐसे पदार्थ हैं जिनमें हाइड्रॉक्सिल समूह होते हैं और जो विलयन में हाइड्रॉक्सिल आयन (OH-) बनाते हैं। सोडियम हाइड्रॉक्साइड, पौटेशियम हाइड्रॉक्साइड, सोडियम कार्बोनेट आदि महत्वपूर्ण क्षारक हैं। ऐसे क्षारक जो जल में घुलनशील होते हैं उन्हें क्षार (alkalies) कहा जाता है।
लवण (Salt)- लवण आयनिक यौगिक होते हैं। अम्ल और क्षार के बीच परस्पर अभिक्रिया होने से लवण एवं जल बनते हैं। इस अभिक्रिया को उदासीनीकरण (neutralisation) कहते हैं। सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट इसके उदाहरण हैं।
PH_ विलयन के ग्राम आयन प्रति लीटर में हाइड्रोजन आयन का ऋणात्मक लघुगणक (Logarithm) PH कहलाता है।



PH =-log[H+]


यह ० से 14 तक बिना किसी मापक इकाई के एक संख्या मात्र होती है। यदि क्क॥ का मान 0 से 6.9 के बीच है तो विलयन अम्लीय होता है, जबकि यही मान यदि 7.1 से 14 के बीच हो तो विलयन क्षारीय होता है। ऐसा विलयन जिसका PH 7 है, वह उदासीन होता है।


कोलाइड्स और कोलाइडल अवस्था


स्टार्च, गोंद, सरेस आदि पदार्थ जो अक्रिस्टलीय हैं और घुलनशील अवस्था में विसरित नहीं होते हैं या जिनमें जन्तु या पादप झिल्ली को पार करने की प्रकृति कम होती है, उन्हें कोलॉइड कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-
द्रवस्नेही कोलॉइड (Lyophilic colloids)- वे पदार्थ जैसे गोंद, जिलेटिन, स्टार्च, रबड़ आदि जो उपयुक्त द्रव, परिक्षेपण माध्यम में सीधे मिश्रित होकर कोलाइडल सॉल बनाते हैं, द्रवस्नेही ही कहलाते हैं।
द्रव विरोधी कोलॉइड (Lyophobic colloids) - धातुएँ और उनके सल्फाइड आदि सामान्य रूप से परिक्षेपण माध्यम से मिश्रित होकर कोलॉइडल सॉल का निर्माण नहीं करते हैं, बल्कि उनके कोलॉइडल सॉल का निर्माण केवल विशेष विधियों से होता है।






मिसेल्स-सहयोजित कोलाइड


वे पदार्थ जिन्हें जब कम सांद्रण पर एक माध्यम में मिश्रित किया जाता है तो वह सामान्य रूप से व्यवहार करते हैं, लेकिन अधिक सांद्रण पर संगठित कणों के निर्माण की वजह से कोलाइडी अवस्था के गुण रखते हैं तो उन्हें 'सहयोगी कोलाइड' अथवा मिसेल्स कहते हैं। साबुन और कृत्रिम डिटर्जेन्ट इस वर्ग में आते हैं।


पायस (Emulsion)


पायस एक ऐसा कोलाइडल प्रसाव है जिसमें 'प्ररिक्षिप्त प्रावस्था' और 'परिक्षेपण माध्यम' दोनों ही द्रव हैं। पायस का निर्माण दो द्रवों के मिश्रण को तेजी से हिलाकर या मिश्रण को कोलाइडल 'मिल' से प्रवाहित करके किया जाता है, जिसे समाँग कारक कहते हैं।


कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)


कार्बोहाइड्रेट्स ऐसे पदार्थ हैं जिनका सामान्य सूत्र Cx (H2O)y है। इनमें हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के परमाणुओं का अनुपात उतना ही होता है जितना की जल में। इसलिए इन्हें कार्बोहाइड्रेट्स कहते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स को सामान्यत: शर्करा भी कहते हैं। इन्हें दो भाग में विभाजित किया जाता है-
शर्करा- इसे भी दो भागों में विभाजित किया जाता है।

मोनोसैक्राइड्स- इसका जलीय विघटन नहीं किया जा सकता है। इसका सामान्य सूत्र CnH2nOn है।
ऑलीगोसैक्राइड्स- इनके जलीय विघटन से 2-10 मोनोसैक्राइड अणु प्राप्त होते हैं। डाईसैक्राइड्स के उदाहरण सुक्रोज (C12H22O11), माल्टोज (C12H22O11), सेलोबायोज व लैक्टोज (C12H22O11) हैं।
पॉलीसैक्राइड्स- पॉलीसैक्राइड एकक शर्करा के बड़े बहुलक हैं जिनका अणुभार कई हजार से कई लाख होता है। इनके उदाहरण- स्टार्च (C6H10O5)n, ग्लाइकोजेन, पेक्टीन्स सेलुलोज इत्यादि हैं।

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