Saturday, 2 January 2016

About Women empowerment

मुद्दा : महिला सशक्तिकरण : श्रम भागीदारी : विश्लेषणात्मक परिचर्चा

दोस्तों हम सभी जानते हैं की हमारे देश भारत में लैंगिक विभेद के कई मामले सामने आ चुके हैं। और यह एक ज्वलंत मुद्दा है जो आज भी सामाजिक चिंतको , राजनितिक चिंतकों , भारतीय संसद, मानवाधिकार आयोग के साथ साथ राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय रिपोर्टों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। जब आज विदित है की 21 वीं सदी में आधुनिकता ने जीवन शैली ,संस्कृति में अभूतपूर्व परिवर्तन किया है किन्तु सामाजिक विचारधारा में आमूल चुल परिवर्तन के अलावा कोई और परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। लोग आज भी पुरुष प्रधानता जैसी संकीर्ण मानसिकता से ग्रसित हैं। क्या यह उचित है स्वयं के लिए और राष्ट्र के निर्माण में?
जहाँ रणनीतिकारों ने सम्भावना जताई है कि 2022 तक देश की जनसँख्या प्रतिस्पर्धी देश चीन की जनसँख्या को पीछे छोड़ देगी, और जी डी पी के मामले में भी चीन से तुलनात्मक रूप में बढ़ोत्तरी हांसिल कर लेगी, उन परिस्थितियों में यदि हम वैश्विक आर्थिक महाशक्ति होने का ख्वाब देख रहे हैं तो क्या उचित है कि देश में उपलब्ध मानव श्रम का एक बड़ा अंश जो महिला हैं उनकी उपयोगिता को नजरअंदाज कर दिया जाये केवल इस संकीर्ण मानसिकता ‘पुरुष प्रधानता’ को सही साबित करने के लिए?
मित्रो मेरा मानना है की हम सभी को राष्ट्र हित में और स्वयं के क्रय मूल्य समता में वृद्धि हेतु महिला श्रमबल को भरपूर समर्थन देना चाहिए। सरकार को प्रयास करना चाहिए की अकुशल महिला श्रम संशाधनों को कुशल मानव संसाधन में परिवर्तन हेतु उचित नीतियों और शैक्षिक कार्यक्रमो की रुपरेखा बनानी चाहिए। जिसका परिणाम होगा की महिला सशक्तिकरण का उपयोग एक सही दिशा में हो पायेगा। और यह प्रयास व्यक्तिगत स्तर के साथ साथ सार्वभौमिक भी होना आवश्यक है, इसके लिए लोगो को जागरूक किये जाने हेतु भी सरकार को अनेक माध्यमो का इस्तेमाल करना चाहिए और इस प्रयास में मिडिया और सोशल साइट्स नेटवर्क्स अपनी महती भूमिका निभा सकते हैं।
यहाँ हम विभिन्न राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट्स को आधार मानते हुए इस मुद्दे के निहितार्थ आवश्यकता को बताने का प्रयास करेंगे
जनगड़ना 2011 : ने बीते दो दशको से रोजगार वृद्धि के गिरते रुख को लेकर जारी चर्चा को नए आयाम दिए हैं। NSSO(नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाईजेशन) के श्रम शक्ति अनुमान से तुलना करने पर हम पाएंगे की 2001 से 2011 के मध्य समूची श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी तुलनात्मक रूप से घटी है।शैक्षिणिक संस्थानों में जहाँ 2001 से 2011 के बीच महिलाओं की भागीदारी दिखती है वहीं ग्रामीण भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 18.3% है जबकि पुरुष श्रमिको की भागीदारी 47.4% है। यह अंतर शहरी क्षेत्रो में बढ़ जाता है।IMF रिपोर्ट: आईएमएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यदि भारत की कार्यसंस्कृति में स्त्री-पुरुष असमानता और लैंगिक विभेद ख़त्म हो जाए तो अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ जायेगा और समग्र रूप से जी डी पी 27% बढ़ जायेगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एशिया-प्रशांत मामलो की डिप्टी डायरेक्टर कल्पना कोछर ने कहा कि भारत के कामकाजी लोंगों में स्त्री पुरुष का अंतर 50% के आसपास है। OECD देशों में यह 12% है। भारत में अंतर ज्यादा है। यदि भारत इस विभेद को जल्द से जल्द ख़त्म कर लेता है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को ही होगा।मैकिंजे रिपोर्ट : यदि भारत ने लैंगिक असमानता को समाप्त कर दिया तो 2025 में भारत को 46 लाख करोङ रूपए का अतिरिक्त लाभ होगा। जी डी पी वृद्धि दर में 1.4 फ़ीसदी का अतिरिक्त इजाफा होगा।

मकिंजे ग्लोबल इंडिया : पॉवर ऑफ़ पैरिटी रिपोर्ट 2015 :- मकिंजे ग्लोबल इंडिया ने पॉवर ऑफ़ पैरिटी:एडवानसिंग विमेंस इक्वलिटी इन इंडिया के आधार महिला विकास के विभिन्न सन्दर्भों पर चर्चा की। अगर कामकाजी महिलाओं और पुरुषो में विभेद पूरी तरह से ख़त्म हो जाये तो वर्ष 2025 में भारत के सकल घरेलु उत्पाद यानी जी डी पी को 188 लाख करोङ रुपए का अतिरिक्त लाभ होगा। लेकिन ये तभी सम्भव है जब भारतीय अर्थव्यवस्था में 6.8 करोड़ कामकाजी महिलायें अपना योगदान दें।मैकिंजे ने भारत में स्त्री पुरुष असमानता के मापन हेतु भारत के लिए एक नया इंडेक्स का निर्माण कर रहा है। जिसे ‘इंडिया फीमेल एम्पावरमेंट इंडेक्स'(फेमडेक्स) कहा जायेगा। जो भारत के विभिन्न राज्यों जहा स्त्रीपुरुष समानता के मामले में शीर्ष राज्य मिजोरम , केरल, मेघालय, गोवा, और सिक्किम हैं। वाही निमस्तर जहाँ असमानता ज्यादा है- बिहार, मध्यप्रदेश, असम, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य आते हैं।‘पॉवर ऑफ़ पैरिटी : एडवानसिंग वुमेन्स इक्वलिटी इन इंडिया’ रिपोर्ट में कहबगया है की देश में महिलाओं के साथ हर क्षेत्र में भेदभाव होता है। स्वयत्तता, शारीरिक सुरक्षा, जरुरी सेवायें, कानूनी सुरक्षा, राजनितिक नेतृत्व, आर्थिक अवसर, और काम जैसे जीवन का कोई सा क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाँ उनसे समानता का बर्ताव किया जाता हो। स्वाभाविक है की जब उन्हें अवसर ही नहीं मिलते तो वे अपना योगदान भी नहीं दे पातीं। महिला पुरुष में घरेलु जिम्मेदारियों का ही यदि बंटवारा देंखे तो वह भी असमान है, मतलब घरेलु कार्य जहा महिला अपना योगदान श्रम द्वारा करती है परंतु इसके बदले उन्हें कोई भुगतान नहीं किया जाता। कार्य के घंटे के हिसाब से देंखे तो महिलायें तुलनात्मक रूप से पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं परंतु भुगतान रहित।अगर वैश्विक संदर्भो की चर्चा करे तो इस रिपोर्ट में शामिल 95 देशों में से 26 ही प्रति व्यक्ति जी डी पी और मानव विकास इंडेक्स में भारत से पीछे हैं । लेकिन स्त्री पुरुष समानता के मामले में ये देश भारत से कही आगे हैं।

WEF(वर्ल्ड इकनोमिक फोरम) : ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स रिपोर्ट 2015-राजनितिक नेतृत्व में महिलाओं के बेहतर प्रतिनिधित्व के अवसर के सहारे भारत विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक लिंग अंतर सूचकांक में 145 देशों में अपना स्थान बेहतर करते हुए 108 वां स्थान प्राप्त किया है जबकि आइसलैंड ने प्रथम तथा नार्वे और फिनलैंड ने क्रमशः दूसरा एवं तीसरा स्थान प्राप्त किया है। यह रैंकिंग आर्थिक भागीदारी एवं रोजगार के अवसर, शैक्षिणिक प्राप्ति, स्वास्थ्य एवं जीवन और राजनितिक सशक्तिकरण के लिहाज से देशों के प्रदर्शन पर आधारित है। ब्रिक्स देशों में भारत सबसे निचले पायदान पर है वही साउथ अफ्रीका शीर्ष पर काबिज है।
निष्कर्ष
विभिन्न रिपोर्ट्स और चर्चा के आधार पर यह सच प्रतीत होता है की भारत में मानव संसाधन का 50% महिलाओं का हिस्सा है, परंतु इस बड़ी आबादी का आज भी समुचित और सार्थक उपयोग नहीं किया जा सका है। कदाचित भारत में अभी भी रूढ़ मानसिक प्रवृत्तियाँ उपस्थित हैं लेकिन फिर भी सरकार का प्रयास होना चाहिए की इन रूढ़िवादी विचारधारा को समाप्त करने हेतु जनजागरूकता के कार्यक्रम को वृहत स्तर पर चलाये। ताकि लोग महिलाओं को केवल उपभोग की वास्तु न समझकर उनके उपयोगी श्रम और ऊर्जा का सही इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित हो। क्योंकि यदि महिलाओं का 50 फीसदी हिस्सा यदि कुशल श्रम में बदल गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था का आकर तो बढ़ेगा ही साथ ही परिवार की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी जो गरीबी उन्मूलन की एक आवश्यक शर्त भी है।
समाज को भी अब समझना चाहिए की यदि उन्होंने अपने बालिकाओं को प्रोत्साहित कर और भ्रूण हत्या जैसे विकृत गतिविधियों को छोड़ दे तो वह दिन दूर नहीं जब महिलाये विकास के हर क्षेत्र में परचम लहरायेगी। और पुरुषो से कंधे से कन्धा मिलाकर कार्य करेंगी। ऐसा तभी संभव है जब सरकार इसके लिए सामाजिक राजनितिक और विधायी प्रयास करे। सच है अगर यह दिवास्वप्न यदि हकीकत में बदल जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम विश्व की आर्थिक महाशक्ति के साथ साथ सामरिक शक्ति भी होंगे।

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