Tuesday, 24 November 2015

Effective nuclear agreement between Iran and the powerful nations in hindi

ईरान एवं शक्ति राष्ट्रों के मध्य परमाणु समझौता प्रभावी
परमाणु शस्त्र की भयावहता एवं इसके दूरगामी दुष्परिणाम से विश्व समुदाय परिचित हो चुका है। एक भी परमाणु हमला संपूर्ण विश्व को विनाश की ओर ले जा सकता है। वर्तमान में, देशों के मध्य तनावपूर्ण प्रतिस्पर्धा, अनेक देशों की आंतरिक अस्थिरता, क्षेत्रीय मुद्दों पर वैश्विक रुचि एवं हस्तक्षेप की बढ़ती प्रवृत्ति, आतंकवाद के संस्थागत स्वरूप एवं राष्ट्रों के संसाधनों तक बढ़ती पहुंच जैसी परिस्थितियों के आलोक में उक्त तर्क और भी प्रबल होता है। अब, विश्व किसी भी अन्य राष्ट्र के परमाणु शस्त्र तक पहुंच का जोखिम नहीं उठाना चाहता है। किसी राष्ट्र के परमाणु शस्त्र तक पहुंच न तो मानवता के पक्ष में होगा और न ही विश्व शांति के अनुकूल।
विगत कुछ वर्षों से ईरान के तथाकथित शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम को विश्व समुदाय द्वारा शंका की दृष्टि से देखा जा रहा है। परमाणु संयंत्रों की ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (IAEA) से जांच के इंकार ने, ईरान के शेष विश्व से संबंधों में कटुता उत्पन्न किया जिसकी परिणति कठोर आर्थिक-राजनैतिक प्रतिबंधों के रूप में हुई। इसी संदर्भ में ईरान एवं शक्ति राष्ट्रों यथा-सं.रा. अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन एवं जर्मनी के मध्य अनेक वार्ताएं आयोजित की गईं। दो वर्षों की मैराथन वार्ता के पश्चात ऑस्ट्रिया की राजधानी नगर वियना में 14 जुलाई, 2015 को एक ऐतिहासिक समझौता जिसे JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) नाम दिया गया, संपन्न हुआ। समझौते का प्रमुख उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार प्राप्त करने से रोकना है जबकि यह सुनिश्चित करना कि शांतिपूर्ण उद्देश्यों हेतु ईरान का परमाणु कार्यक्रम जारी रहे। समझौते के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं-
ईरान एवं शक्ति राष्ट्रों के मध्य 14 जुलाई को वियना में संपन्न हुआ परमाणु समझौता 18 अक्टूबर, 2015 से प्रभावी हुआ।
समझौते के तहत ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार (वर्तमान में 10,000 किग्रा.) में 98 प्रतिशत की कटौती करनी होगी।
ईरान को अपने मौजूदा सेंटीफ्यूजों (20 हजार सेंटीफ्यूज) में दो-तिहाई कटौती करनी होगी। इस्तेमाल न किए जाने वाले सेंटीफ्यूजों को IAEA की देख-रेख में रखा जाएगा।
ज्ञातव्य है कि सेंटीफ्यूज के माध्यम से ही यूरेनियम का संवर्धन होता है।
ईरान शांतिपूर्ण उद्देश्यों हेतु अगले 15 वर्षों तक 300 किग्रा. तक 3.67 प्रतिशत यूरेनियम का संवर्धन कर सकता है। ज्ञातव्य है कि 3.67 प्रतिशत का संवर्धित यूरेनियम से परमाणु शस्त्र नहीं बनाया जा सकता अपितु ऊर्जा निर्माण हेतु यह पर्याप्त है।
समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षक ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों की निगरानी कर सकेंगे। ये निरीक्षक ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों का भी निरीक्षण कर सकेंगे।
ईरान अगले 15 वर्षों तक नवीन यूरेनियम संवर्धन या भारी जल प्रतिष्ठान का निर्माण नहीं करेगा।
JCPOA के तहत ईरान पर हथियार खरीदने के लिए लगाया गया प्रतिबंध पांच वर्षों के लिए जारी रहेगा जबकि मिसाइल प्रतिबंध आठ वर्षों तक बना रहेगा।
JCPOA का ईरान पर प्रभाव
JCPOA के तहत ईरान को तेल और गैस के कारोबार, वित्तीय लेन-देन, उड्डयन और जहाजरानी के क्षेत्र में लागू प्रतिबंधों मंत ढील दी जाएगी। इससे ईरान का अन्य देशों के साथ व्यापार बढ़ेगा।
अब ईरान की अरबों डॉलर की सील सम्पत्ति को जारी किया जा सकेगा।
ईरान की आय के प्रमुख स्रोत तेल एवं प्राकृतिक गैस का निर्यात बढ़ेगा। ज्ञातव्य है कि ईरान प्रमुख तेल निर्यातक देशों में से एक है।
प्रतिबंध से पहले ईरान 22 लाख बैरल प्रति दिन कच्चे तेल का निर्यात करता था जो वर्तमान में 13 लाख बैरल प्रति दिन के करीब रह गया है।
JCPOA का भारत पर प्रभाव
भारत सदैव से परमाणु शस्त्र मुक्त विश्व का समर्थक रहा है।
भारत का ईरान के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। इस समझौते से भारत-ईरान द्विपक्षीय आर्थिक एवं रणनीतिक सहयोग में वृद्धि होगी।
प्रतिबंध के अभाव में भारत को कम कीमत पर ईरान से तेल के आयात की सुविधा मिलने की संभावना है जिससे न केवल आयात बिल में कमी आएगी अपितु ऊर्जा सुरक्षा तथा निर्यात पर भी इसके दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।\
अब भारत कृषि उत्पादों, विनिर्मित वस्तुओं एवं सेवाओं का ईरान को सुगमतापूर्वक निर्यात कर सकेगा।
भारत को ईरान के आधारभूत संरचना के निर्माण में निवेश का अवसर प्राप्त होगा तथा पूर्व में किए गए निवेश (जैसे-फ़रज़ाद में गैस उत्पादन हेतु 100 मिलियन डॉलर का निवेश) जो प्रतिबंध के कारण रुके हुए थे, से आमदनी प्राप्ति की संभावना भी है।

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